Monday, 29 December 2025

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Beli : 1 : 27

पवित्र बीजक  : प्रग्या बोध : बेलि  : 1 : 27

बेलि  : 1 : 27

आगि  जो  लागी  सरवर  में ,  हो  रमैया  राम  ! 

शब्द  अर्थ  : 

आगि  = तृष्णा  , इच्छा ,  माया ,  मोह  ,अहंकार  ! जो  लागी  = जो  है  ! सरवर  में  = संसार  में  , शृष्टी  में  ,  मानव जीवान  में  ! 

प्रग्या बोध : 

परमात्मा  कबीर  बेलि  के  इस  पद  में  कहते  है  भाईयों  संसार  मे  माया  मोह इच्छा  तृष्णा  अहंकार  नाम  की  अग्नी  संसार  को  जला  रही  है  जैसे  पेट  में  भूक  की  अग्नी  जलाती  है  अन्न  मांगती  है  और  उसके  लिये  क्या  क्या  नही  करना  पडता  हत्या  , ज़िन्दा  निगलना  मार  कर  खाना  आदी  आदी  !  यह  सब  तृष्णा  है  ! चौरी  झूठ  सुरा  पाना , व्यभीचार  सब  तृष्णा  के  ही  रूप  है  ! यह  न  होते  तो  सब  कितने  खुशी  से  रहते  जरा  सोचो  !  इस  तृष्णा  पर  धर्म  आचरण  , शिल  सदाचार  की  शिक्षा  अंकुश  रखती  है  अगर  धर्म  ही  न  हो  तो  संसार  तो  मार  काट लूट  चौरी  झूठ  माक्कारी   के  कारण  रहने  लायक  ही  न  रहे  ! 

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती  
मुलभारतिय  हिन्दुधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान 
कल्याण,अखण्ड हिन्दुस्तान, शिवशृष्टी

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