#छत्रपती_शिवाजी_महाराज_दलित_थे !
कवडी की माला दलित की l पहचान :
ऐतिहासिक रूप से, दलितों (विशेषकर केरल ,आंध्र , महाराष्ट्र और अन्य क्षेत्रों में) को फूटी कौड़ी की माला पहनने के लिए मजबूर किया जाता था। यह उनकी निम्न जाति की स्थिति को दर्शाने, उन्हें सवर्णों से अलग पहचानने और उन पर सामाजिक बंदिशें (जैसे ऊपरी कपड़े न पहनने देना) लागू करने का एक दमनकारी प्रतीक था, जिसे बाद में अय्यंकली जैसे नेताओं के प्रयासों से खत्म किया गया।
दमनकारी पहचान:
कौड़ी की माला दलितों को "अछूत" के रूप में दूर से ही पहचानने की एक पहचान थी।
गुलामी का प्रतीक: यह सामाजिक असमानता और गुलामी को दर्शाता था, जिसे पहनना उस समय अनिवार्य माना जाता था।
परिधान नियम:
यह प्रथा दलित महिलाओं पर ऊपरी शरीर को न ढकने के नियम का हिस्सा थी।
विरोध और अंत: दक्षिण भारत में अय्यंकली ने इस कुप्रथा के खिलाफ लड़ाई लड़ी और दलित महिलाओं को इस माला को फेंककर सम्मान से जीने का अधिकार दिलाने का नेतृत्व किया।
कौड़ी की माला का उपयोग सामाजिक तौर पर एक "चिह्न" के रूप में किया जाता था ताकि ऊँची जाति के लोग अपनी शुद्धता बनाए रख सकें और दलितों की उपस्थिति को पहचान सकें।
तुलजा भवानी :
तुलजा भवानी शिवाजी कुल की कुल देवाता को फूटी कवाडी की माला पहने देखा जा सकता है , कबीर पन्थी को भी तुलसी की माला या कवडी की माला या रुद्राक्ष की माला ही पहनने की अनुमती थी !
छत्रपती शिवाजी महाराज के माता पिता का दोनो कुल जाधव और भोसले कबीर पन्थी दालित ही थे ! जैसे की गांधी और आम्बेडकर परिवार !
अनंता यह प्रतित होता है की छत्रपती शिवाजी माहाराज दलित थे जो अपनी शुझबुझ , संघटन कुशलता और अनोखी तखनिक गनिमी कावा की युद्ध निती और माँ ज़िजाई की इच्छा और कबीर पन्थी गुरू मौनी महाराज और बहादुर दलित मावला सैनिक निष्ठा के कारण समतावादी स्वदेशी हिन्दवी स्वराज स्थापन कर सके !
आज छत्रपती शिवाजी माहाराज की जयंती है !
कबीर अनुयायी मुलभारतिय हिन्दूधर्मी छत्रपती शिवाजी महाराज की जय !