Friday, 20 February 2026

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Hindola : 2 : 2

पवित्र बीजक : प्रग्या बोध :  हिण्डोला : 2 : 2

हिण्डोला  : 2 : 2

जाहि   न   इच्छा  झुलबे  की , एसी  बुधि  केहि  पास  ! 

शब्द  अर्थ  : 

जाहि  न  = जहा  नही  ! इच्छा  = चाहत , मोह ! झुलबे  की  =  संसार  की  ,  हिण्डोला  मे  झुलने  की ! एसी  बुधि  = एसी  मति  , समझ , ग्यान  ! केहि   पास  = किसके  पास  है  ! 

प्रग्या  बोध  : 

परमात्मा  कबीर  हिण्डोला के  इस  पद  में  कहते  है भाईयों  संसार  में  इच्छा  तृष्णा  वासना  कामना लालच  माया  मोह  रहित  कोई  नही  है !  इसी  कारण  यहाँ  जन्म  मृत्यू  के  फेरे  में  हर  कोई  फसा है !  इच्छा  नही  , तृष्णा  नही  एसी  मति  , ग्यान  , प्रग्याबोध  रखने  वाले लोग बहुत  कम  है  क्यू  की  सत्यधर्म  का  पालन  करने  वाले  लोग  कम  है  इस  लिये  झुला  झुलने  वालोंकी  भीड  ही  अधिक  है  !

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती 
मुलभारतिय हिन्दुधर्म विश्वपीठ ,
कल्याण , अखण्ड हिन्दुस्तान , शिवशृष्टी

Thursday, 19 February 2026

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Hindola : 2 : 1

पवित्र बीजक : प्रग्या बोध :  हिण्डोला  :  2 : 1

हिण्डोला :  2 : 1

बहु  विधी  चित्र  बनाय  के ,  हरि  रचिन  क्रीडा   रास  !

शब्द  अर्थ  : 

बहु  बिधि  = अनेक  प्रकार  के !  चित्र  बनाय =   वस्तु , जीव  जन्तु   ! हरि  = चेतन  तत्व  राम  ! क्रीडा  रास   = खेल  ! 

प्रग्या  बोध  : 

परमात्मा कबीर हिण्डोला के इस पद में कहते है भाईयों  संसार एक प्रकार  का  खेल  का  मैदान  है  ज़िसमे  चेतन  राम  हरि  यानी  इच्छा रहित  बनकर  खेल  कर  रहे  है  ! 

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती  
मुलभारतिय हिन्दुधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान 
कल्याn , अखण्ड हिन्दुस्तान , शिवशृष्टी

Wednesday, 18 February 2026

Shivaji Maharaj Dalit The ! Daulatram

#छत्रपती_शिवाजी_महाराज_दलित_थे  ! 

कवडी की माला दलित की l पहचान  :  

ऐतिहासिक रूप से, दलितों (विशेषकर केरल ,आंध्र , महाराष्ट्र और अन्य क्षेत्रों में) को  फूटी  कौड़ी  की माला पहनने के लिए मजबूर किया जाता था। यह उनकी निम्न जाति की स्थिति को दर्शाने, उन्हें सवर्णों से अलग पहचानने और उन पर सामाजिक बंदिशें (जैसे ऊपरी कपड़े न पहनने देना) लागू करने का एक दमनकारी प्रतीक था, जिसे बाद में अय्यंकली जैसे नेताओं के प्रयासों से खत्म किया गया। 

दमनकारी पहचान: 

कौड़ी की माला दलितों को "अछूत" के रूप में दूर से ही पहचानने की एक पहचान थी।
गुलामी का प्रतीक: यह सामाजिक असमानता और गुलामी को दर्शाता था, जिसे पहनना उस समय अनिवार्य माना जाता था।

परिधान नियम: 

यह प्रथा दलित महिलाओं पर ऊपरी शरीर को न ढकने के नियम का हिस्सा थी।
विरोध और अंत: दक्षिण भारत में अय्यंकली ने इस कुप्रथा के खिलाफ लड़ाई लड़ी और दलित महिलाओं को इस माला को फेंककर सम्मान से जीने का अधिकार दिलाने का नेतृत्व किया। 
कौड़ी की माला का उपयोग सामाजिक तौर पर एक "चिह्न" के रूप में किया जाता था ताकि ऊँची जाति के लोग अपनी शुद्धता बनाए रख सकें और दलितों की उपस्थिति को पहचान सकें। 

तुलजा  भवानी  : 

तुलजा  भवानी  शिवाजी  कुल  की  कुल  देवाता को  फूटी कवाडी  की  माला  पहने  देखा  जा  सकता  है  , कबीर  पन्थी  को  भी  तुलसी  की  माला  या कवडी  की  माला  या  रुद्राक्ष  की  माला  ही पहनने की अनुमती  थी  ! 

छत्रपती  शिवाजी  महाराज  के  माता  पिता  का दोनो  कुल  जाधव  और  भोसले  कबीर  पन्थी  दालित  ही  थे  !  जैसे  की  गांधी  और  आम्बेडकर  परिवार  ! 

अनंता  यह  प्रतित  होता  है  की  छत्रपती  शिवाजी  माहाराज   दलित  थे  जो  अपनी  शुझबुझ  , संघटन कुशलता  और  अनोखी  तखनिक  गनिमी  कावा की  युद्ध  निती  और  माँ  ज़िजाई  की  इच्छा  और   कबीर पन्थी  गुरू   मौनी  महाराज  और   बहादुर दलित मावला  सैनिक  निष्ठा  के  कारण  समतावादी  स्वदेशी  हिन्दवी  स्वराज  स्थापन  कर  सके  ! 

आज  छत्रपती  शिवाजी  माहाराज  की  जयंती  है  ! 
कबीर  अनुयायी  मुलभारतिय  हिन्दूधर्मी  छत्रपती शिवाजी  महाराज  की  जय  ! 

#दौलतराम

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Hindola : 1 : 19

पवित्र बीजक : प्रग्या बोध  : हिण्डोला  :  1 : 19

हिण्डोला  : 1 : 19

कहहिं  कबीर  सत  सुकृत  मिलै  , तो  बहुरि  न  झुले  आन  ! 

शब्द  अर्थ  : 

कहहिं कबीर = कबीर  कहते  है  ! सत  सुकृत  = सन्त क्रियावान  ! मिलै  = मिले  ! तो  बहुरि  = तो  फिर  ! न  झुले  आन = फिर  इस  हिण्डोला   मे  न  फसे  ! 

प्रग्या  बोध : 

परमात्मा  कबीर  हिण्डोला  के  इस  पद  में  कहते  है  भाईयों  संसार  रूपी  इस  हिण्डोला  का  आनन्द  बिना  फसे  कैसे  उठाये  यह  जानकार  क्रियाशिल   संत  ही  दे  सकता  है  बातुनी  संत  नही  !  ऐसा  संत  विरला  होता  है  ज़िसने  इस  झुले  को  झुला  भी  और  बेदाग  बाहर  आया  !  ये  विरक्ती  की  शिक्षा  बडी  अद्भूत  शिक्षा  है  जो  कोई  ग्यानी  ही  दे  सकता  है  ज़िस  ने  चेतन  राम  तत्व  के  स्वरूप  को  खुद  पहचान  लिया  हो  !  सुनी  सुनायी  बात  पर  भरोसा  न करो  !  एसे  रस्ते  चलो  जीसका  जानकार  गुरू  खुद  उस  रास्ते  चल  कर  निर्वांण  की  अवस्था   हासिल  की  हो  !  विदेशी यूरेशियन वैदिक ब्राह्मणधर्मी  पंडित  जो  स्वर्ग  नर्क  होम  हवन  आदी  का  जो  मार्ग  बताते   है  झूठ  है  ! वे  झूठे  गुरू  है  कोई  साधु  सन्त  नही  ! वो  मार्ग  और  धर्म  ही  गलत  है  जो  समता  शिल  सदाचार  के  रास्ते  पर  न  चले  ! 

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती 
मुलभारतिय हिन्दुधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान, कल्याण ,अखण्ड हिन्दुस्तान, शिवशृष्टी

Tuesday, 17 February 2026

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Hindola : 1 : 18

पवित्र बीजक : प्रग्या बोध :  हिण्डोला  : 1 : 18

हिण्डोला  : 1 : 18 

ये  झुलबे  को  भय  नहिं  , जो  होय  सन्त  सुजान  : 18

शब्द  अर्थ  : 

ये  झुलबे  = इस  संसार  रूपी  हिंडोले  ! को  = इसका  ! भय  नहिं  = भय  , डर  नही  लगाता  है  ! जो  होय  = जो  है  ! सन्त  सुजान  =  जानकार , ग्यानी  ! 

प्रग्या  बोध : 

परमात्मा  कबीर  हिण्डोला  के  इस  पद  में  कहते  है  भाईयों  इस  संसार  का  भय  या  डर  उन  ग्यानी , जानकार ,  प्रग्याबोधी  साधु  संत  गुरूजानो  को  नही  लगता  है  जीनको  इस  संसार  रूपी  झुले  के  स्वरूप  , कार्यपद्धती  , तंत्र  और  चालने  वाले  की  मनशा जानता  हो  !  भाई  ये संसार  रूपी  झुला  परमात्मा  ने  आपको  परेशान  करने   के  लिये  नही  बनाया  है  बल्की  इसे  आपके  खुशी  , मनोरंजन  के  लिये  बनाया  है !   तब  तक  इस  में  बेडर  खुशी और  आनन्द  ले  कर  झुलो  जब  तक  तुम  कुछ  उल्टेसिधे  काम  नही  करते  , उसके  तंत्र  नियम के  साथ  छेडछाड   नही  करते  ,  बगावत  नही  करते  ! धर्म  नियम  न  मानोगे  , झुले  के  मालिक  का  कहना  इच्छा  आदेश  संकेत  नही  मानोगे  तो  झुले  के  भवचक्र  , परिणाम  , जन्म  मृत्य  के  फेरे   फस  जावोगे  !  अच्छे  कर्म  करो  तो  अच्छा  फल यही  उस  मालिक  चेतन  तत्व  राम  का  संकेत  है  जो  लगातार  आपको  वह  देता  रहता  है  !  उसे सुनो  अंतरआत्मा  राम  की  आवाज  सुनो  वो  तुम्हे  खुशी  देना  चाहता  है  दुख  नही !  दुख  का  चयान तो  तुम  लालच  माया  मोह  अहंकार  आदी  के  कारण  अग्यानी  बन  कर  करते  हो  !  जो  साधु  सज्जन  इसे  जानता  वही  सुजान  संत  है  ! 

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती 
मुलभारतिय हिन्दुधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान 
कल्याण , अखण्ड हिन्दुस्तान, शिवशृष्टी

Monday, 16 February 2026

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Hindola : 1 : 17

पवित्र  बीजक :  प्रग्या बोध : हिण्डोला : 1 : 17

हिण्डोला  : 1 : 17

साधु  संगति  खोजि   देखहु , बहुरि न  उलटि  समाय  !

शब्द  अर्थ  : 

साधु  संगति  = साधु  की  बैठक  , संगत  ! खोजि  देखहु  = जा  कर  देखा  ! बहुरि न  उलटि  समाय  = फिर  जाने  की  इच्छा  नही  हुवी  ! 

प्रग्या  बोध : 

परमात्मा  कबीर  हिण्डोला  के  इस  पद  में  कहते  है  भाईयों  मैने  बहुत  सारे  साधु  की  मंडली  देखि !   वहा  जाकर  उनकी  बात  सुनी !   रहन. सहन   देखा  खानपान  , आचार   विचार  देखे !   पर  मुझे  कोई  शिल  सदाचार  भाईचारा समता नही  दिखी  ! जाती  वर्ण  ऊचनीच  भेदभाव  अस्पृष्यता  देखि !  हत्या  झूठ  देखा   गांजा  मदिरा  का  सेवन  देखा !  नशा  व्यभिचार  देखा !  कोई  त्याग  , सत्य  संयम  नही  दिखा  !  एसी  साधु  संगती  मे  मै  फिर  कभी  नही  गया  जहा  धर्म  नही ! 

साधु  की  मंडली , संगती  धर्म  के  लिये  होना  चाहिये  नाकी  दिखावे  के  लिये  ! एसे  साधु  से  तो संसारी  भला  ! 

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती  
मुलभारतिय हिन्दुधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान 
कल्याण , अखण्ड हिन्दुस्तान, शिवशृष्टी

Sunday, 15 February 2026

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Hindola : 1 : 16

पवित्र बीजक : प्रग्या बोध :  हिण्डोला : 1 : 16 

हिण्डोला  : 1 : 16

तहाँ  से  बिछुरे  बहु  कल्प  बीते , भूमि  परे  भूलाय  ! 

शब्द  अर्थ  : 

तहाँ से  = चेतन  तत्व  राम  प्रग्या  बोध  से ! बिछुरे = अलग  हुवे  ! बहु  कल्प  बीते  = बहुत  समय  हुवा  है  ! भुमि  परे  भूलाय  = पृथ्वी पर  जन्म  लेते  है  भूल  गये  ! 

प्रग्या  बोध  : 

परमात्मा  कबीर  हिण्डोला  के  इस  पद  में  कहते. है  भाईयों  आप  वस्तुता  वो  चेतन  तत्व  राम  मालिक  है  जो  निराकार  निर्गुण  अजर  अमर सर्वव्यापी  सार्वभौंम  परमात्मा  हो !  पर  आप  पृथ्वी  पर  जीव  जन्तु  प्राणी  पक्षी  आदी  जन्म  लेते  ही  खुद  की  जानकारी  भूल  कर  मर्त्य  जीव  बन  कर  कुशल  अकुशल  कर्म  करते  हो !  और  उसके  परिणाम  स्वरूप  बार  बार  जन्म  लेते  हो  मरते  हो  ! तुम्हे  तुम  क्या  हो  याद  नही  पर  मै  याद  दिलाना  चाहता   हूँ  क्यू  की  तुम  दुख्ख  भरे  भवचक्र  जन्म  मृत्यू  के  फेरे  से  धर्म  पालन  कर  बच  सको  ! 

धर्म  पालन  करो  अधर्म  को  छोडो  तो  तुम्हे  तुम्हारे  वास्तविक  स्वरूप  का पता  चले   , कुछ  याद  आये  ! 

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती 
मुलभारतिय हिन्दुधर्म  विश्वपीठ प्रतिष्ठान 
कल्याण , अखण्ड हिन्दुस्तान, शिवशृष्टी

पवित्र बीजक : प्रग्या बोध : हिण्डोला : 1 : 16 हिण्डोला : 1 : 16तहाँ से बिछुरे बहु कल्प बीते , भूमि परे भूलाय ! शब्द अर्थ : तहाँ से = चेतन तत्व राम प्रग्या बोध से ! बिछुरे = अलग हुवे ! बहु कल्प बीते = बहुत समय हुवा है ! भुमि परे भूलाय = पृथ्वी पर जन्म लेते है भूल गये ! प्रग्या बोध : परमात्मा कबीर हिण्डोला के इस पद में कहते. है भाईयों आप वस्तुता वो चेतन तत्व राम मालिक है जो निराकार निर्गुण अजर अमर सर्वव्यापी सार्वभौंम परमात्मा हो ! पर आप पृथ्वी पर जीव जन्तु प्राणी पक्षी आदी जन्म लेते ही खुद की जानकारी भूल कर मर्त्य जीव बन कर कुशल अकुशल कर्म करते हो ! और उसके परिणाम स्वरूप बार बार जन्म लेते हो मरते हो ! तुम्हे तुम क्या हो याद नही पर मै याद दिलाना चाहता हूँ क्यू की तुम दुख्ख भरे भवचक्र जन्म मृत्यू के फेरे से धर्म पालन कर बच सको ! धर्म पालन करो अधर्म को छोडो तो तुम्हे तुम्हारे वास्तविक स्वरूप का पता चले , कुछ याद आये ! धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस दौलतराम जगतगुरू नरसिंह मुलभारती मुलभारतिय हिन्दुधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान कल्याण , अखण्ड हिन्दुस्तान, शिवशृष्टी

Saturday, 14 February 2026

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Hindola : 1 : 15

पवित्र बीजक : प्रग्या बोध : हिण्डोला  : 1 : 15

हिण्डोला  : 1 : 15

काल  एकाल  परलय  नहीं , तहाँ  सन्त  बिरले  जाहिं  ! 

शब्द  अर्थ  : 

काल  अकाल  = जन्म  मृत्यू  , समय  का  बन्धन  !  परलय  =  क्षय  , नाश , विनाश  , समाप्ती  !  नहीं  = नही  है  ! तहाँ  = उस  जगह  , स्तिथी  में  ! सन्त  = ग्यानी  , प्रग्या  बोधी  ! बिरले  = क्वचित  ! जाहिं  = पहूचना  ! 

प्रग्या  बोध : 

परमात्मा  कबीर  हिण्डोला  के  इस  पद  में  कहते  है  भाईयों  ये  संसार  मर्त्य  है  ज़हाँ  जन्म  मृत्यू  काल  है !   मोह  माया  का  फंदा  है  !  कर्म  है  , कारण  है  , फल  है  !  धर्म  अधर्म  है  !  पर  यहा  जन्म  लेकार  जीना  मरना  अनिवार्य  है  !  कोई  बिरला  पहूचां  हुवा  साधु  संत  माहत्मा  मुनी  प्रग्या  बोधी  ही  यहाँ  उत्तम   धर्म  कर  निर्मल  रह  कर  उस  स्थिती  या  अवस्था  , पद  को  प्राप्त  होता  है  ज़िसे  निर्वांण  मोक्ष  कहते  है  !  कबीरसत्व परमहंस कहते है  !  यह  अवस्था  उस  निराकार  निर्गुण  चेतन  तत्व   राम  की  है ,  जो  खुद  परमात्मा  कबीर  है  ! 

एक  राम  दशरथ  का  बेटा  राम  हुवा  , दुसरा  राम  घट  घट  मे  है  हर  एक  प्राणी  में  है  , तिसरा राम  जगत  है  पुरा  संसार  है  विश्व  है  !  पर  इन  सभी  मे  काल  है  जन्म  मृत्यू  है  , परिवर्तन  है  क्षय  है  ! चवथी  अवस्था  ही  निर्वांण  मोक्ष  राम  है !  वही  कोई  बिरला  साधु  संत  माहत्मा  पहूचता  है , ज़िसका  मार्ग  मुलभारतिय  हिन्दूधर्म  ही  है  ! 

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती 
मुलभारतिय हिन्दुधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान 
कल्याण , अखण्ड हिन्दुस्तान, शिवशृष्टी

Friday, 13 February 2026

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Hindola : 1 : 14

पवित्र बीजक :  प्रग्या बोध : हिण्डोला : 1 : 14 

हिण्डोला  : 1 : 14 

शशि  सूर  रैनि  शारदी  , तहाँ  तत्व  परलय  नाहिं  ! 

शब्द  अर्थ  : 

शशि = चन्द्र  ! सूर  = सूर्य  ! रैनि  = पानी  ! शारदी  = आवाज ,  ध्वानी  तरंग  ! तहाँ  =  वहाँ  ! तत्व = नियम !  परलय  = मृत्यू  , अंत , दुख्ख  ! नाहिं  = नही  है  ! 

प्रग्या  बोध  : 

परमात्मा  काबीर  हिण्डोला  के  इस  पद  में  कहते  है  भाईयों  मै  उस  जगह  आपको  लेकार  जाना  चाहता  हूँ  जहाँ  न  चन्द्र  है  न  सूर्य  और  तारे ,  न  पानी  न  हवा  न  ध्वनी  न  तरंग  न  वहाँ  प्रलय  है  न  नियम  न  जन्ममृत्यू  का  भय  ना  सुख  और  दुख  ना  इच्छा  न  तृष्णा  !  केवल  परम  शांती  , परम आनन्द  ! अभय   !  वो  जगह  है  चेतन  तत्व  राम  का  निजधाम  !  परमात्मा  कबीरस्थान  की  निर्मल  कुटी , मोक्ष , निर्वांण , निज  दौलत  !  और  उसका  मार्ग  है  मेरा  बताया  हुवा  सदधर्म  समताधर्म  सत्यधर्म  सनातन  पुरातन  आद्यधर्म लोकधर्म  आदिवाशीधर्म  मुलभारतिय  हिन्दूधर्म  ! 

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती  
मुलभारतिय हिन्दूधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान, कल्याण ,अखण्ड हिन्दुस्तान, शिवशृष्टी

Thursday, 12 February 2026

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Hindola : 1 : 13

पवित्र बीजक :  प्रग्या बोध :  हिण्डोला : 1 : 13

हिण्डोला  : 1 : 13

साधु  संगति  खोजि  देखहु , जीव  निस्तरि  कित  जाहिं  ! 

शब्द  अर्थ  : 

साधु  संगति  = साधु  मंड़ली  , प्रवचन , संगत  ! खोजि  देखहु  = खोज  कर  देखा  !  जीव  निस्तरि  = जीव  की  मदत  ! कित  जाहिं  = कितने  जाते  है  ! 

प्रग्या  बोध : 

परमात्मा कबीर हिण्डोला के इस पद में कहते है भाईयों मैने  बहुत  सारे  साधु  संतोंके  आश्रम  , टोलिया  देखि   है  ! खुद  को  साधु कहने  वाले  ये  लोग  समाज  मे  लोगोंके  कोई  काम  के  नही  ! कितने  ही  साधु  केश  बढाकर  , भस्म  फास  कर  गांजा  चिलिम   फुकते  रहते  है  पर  जीव  की  पीडा  नही  समजते  है  ! साधु  का  भेष  बनाया पर  अन्य  जीव  मानव  के  काम  नही  आया  तो  एसे  साधु  होना  निरर्थक   है  , जीवन  व्यर्थ  है  ! साधु  संगत  का  मतलब  समाज  सेवा  होना  चाहिये  ! 

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती  
मुलभारतिय हिन्दूधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान 
कल्याण , अखण्ड हिन्दुस्तान, शिवशृष्टी

Wednesday, 11 February 2026

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Hindola : 1 : 12

पवित्र बीजक : प्रग्या बोध : हिण्डोला : 1 : 12

हिण्डोला  : 1 : 12

खण्ड   ब्रह्मांड  खोजि  देखहु  , छूटत  कितहूँ  नाहिं  ! 

शब्द  अर्थ  : 

खण्ड  = धरती  !  ब्रह्माण्ड  = आकाश  ! खोजि  देखहु  = खोजा  और  देखा  ! छूटत   = मुक्त  ! कितहूँ  नाहिं  = कोई  नही  ! 

प्रग्या  बोध : 

परमात्मा  कबीर  हिण्डोला  के  इस  पद  में  कहते है भाईयों  संसार  को  शृष्टी  को  हमने  बहुत  खोज  कर  देखा  चाहे  धरती  हो  य़ा  आकाश  यहाँ  कोई  पुरी  तरह  मुक्त  नही  है  !  हर  कोई  किसी  न  किसी  प्रकार  बन्धन  में  है !   जन्म  मृत्यू  के  फेरे  से  और  कार्य  कारण  भाव  से  बांधे  है  और   इस  बन्धन  का  डोर  है  सुत्र  है  इच्छा  माया  मोह  अहंकार लालच  तृष्णा  वासना  कामना  चाहत  जैसे  पकडो  ये  डोर  लंबा  ही  होता  जाता  है !   और  अधिक  बंधे  चले  जाते  है  ! मुक्त  कोई  बिरला  ही  है  जो  शिल  सदाचार  का  मुलभारतिय  हिन्दूधर्म  मार्ग  पर  चलता  है  ! 

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती  
मुलभारतिय हिन्दूधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान, 
कल्याण, अखण्ड हिन्दुस्तान, शिवशृष्टी

Tuesday, 10 February 2026

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Hindola : 1 : 11

पवित्र बीजक : प्रग्या बोध :  हिण्डोला : 1 :  11

हिण्डोला  : 1 : 11

खानी  बानी  खोजि  देखहु , अस्थिर  कोई  न  रहाय  ! 

शब्द  अर्थ  : 

खानि  बानी  = शरीर  शब्द , संसार ! खोजि  = ढूंडा  ! देखहु   = देखा  , समज  में  आया  ! अस्थिर  =  अचल  ! कोई  न  रहाय  ! कोई  नही  है  ! 

प्रग्या बोध : 

परमात्मा  कबीर  हिण्डोला  के  इस  पद  में  कहते  है. भाईयों  मैने  सारे  संसार  मे  एक  बात  गौर  करने  वाली  देखि  है !  यहाँ  कोई  अचल  नही  है  , स्थिर  नही  है  !   हर  कोई  चलित  है !   परिवर्तनशिल  है  !  चाहे  जन्म  का  शरीर  हो  या  वस्तु  और  परिणाम  हो  !  हर  कोई  एक  दुसरे  को  प्रभावित  कर  रहा  है  और प्रभावित  हो  रहा  है !  अमर  अजर  अपरिवर्तनिय  कोई  नही !  जो  शरीरधारी  है  सब  मृत्यू  की  और  बढ़ते  है  !  जन्म  मृत्यू  का  चक्र  निरंतर  घुमता  रहता  है  ज़िसे  कर्म  गती  देता  है  वो  कारण  इच्छा  है  !  और  फल  धर्म  अधर्म  है  !  जो  फिर  गती  सदगती  दूर्गती  निछित  करती  है  ! इस  लिये  शिल  सदाचार  भाईचारा  समता  ममता  विश्वबंधुत्व  का  मुलभारतिय  हिन्दुधर्म  का  पालन  करो और  दुखो  से  बचो  ! 

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती  
मुलभारतिय हिन्दुधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान, 
कल्याण, अखण्ड हिन्दुस्तान, शिवशृष्टी

Monday, 9 February 2026

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Hindola : 1 : 10

पवित्र बीजक : प्रग्या बोध : हिण्डोला : 1 : 10

हिण्डोला  : 1 : 10

छौ  चारि  चौदह  सात  एकइस , तीनिउ  लोक  बनाय  ! 

शब्द  अर्थ  : 

छौ = छह  विकार   ! चारि  = चार  योनी ! चौदह  = भुवन !  सात   = खण्ड  !  एकइस  = नर्क ! तीनिउ लोक  ! आकाश  , धरती  की  सतह ,  धरती के  अन्दर  पताल  ! 

प्रग्या  बोध  : 

परमात्मा  कबीर  हिण्डोला  के  इस  पद  में  कहते  है  भाईयों  चेतन  राम  सर्व  व्यापी  सब  का  निर्माता  चालक  मालक  है  चाहे  वो  धर्ती  ही  आकाश  हो  या  धरती  के  अन्दर !   इसने  जीव  जन्तु  सब  की  निर्मिती  की  है  जो  चार  प्रकार  से  है  ! पृथ्वी  पर पानी  और  विभाजन  कर  दिया, खण्ड बनाये ! अनेक  प्रलोभन और  विकार  बानये  और  अनेक  प्रकार  के  दंड  भी  बानये  एसी  वेवस्था  में  मानव  जीवन  बनाया  ज़िसमे  प्रग्या  बोध हो  सकता  है  , गीरे  तो  फिर  भाव  चक्र  , जन्म  मृत्यू  का  फेरा  ,चौरसी  लाख  योनिया  का  जीवन  प्रवास  और  अनेक  प्रयास  के  बाद  फिर अद्भूत  मानव  जन्म  मिलता  है  यह  भी  बर्बाद  हुवा  तो  सब  बेकर  इसलिये  अधर्म  से  बचो  यही  रास्ता  है  ! 

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती 
मुलभारतिय हिन्दुधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान, 
कल्याण , अखण्ड हिन्दुस्तान, शिवशृष्टी

Sunday, 8 February 2026

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Hindola : 1 : 9

पवित्र बीजक :  प्रग्या बोध :  हिण्डोला 1 : 9

हिण्डोला  : 1 : 9 

आप  निर्गुण  सगुण  होय , झुलिया  गोबिन्द  ! 

शब्द  अर्थ  : 

आप  = खुद  ! निर्गुण  सगुण  = गुणी  निर्गुणी  ! होय  = विचार  ! झुलिया  = झुलना  ! गोबिन्द  = कृष्ण  ! 

प्रग्या  बोध : 

परमात्मा  कबीर हिण्डोला  के  इस  पद  में  कहते  है भाईयों  गोविन्द  अर्थात  कृष्ण  ने  अपने  उपदेश  गीता  में  खुद  को  ईश्वर  बताया  और  सगुण  होकर वो  खुद  मानव  जन्म  ज़िये  ! जो  निराकार  निर्गुण  स्वरूप  को  उसने  अर्जून  को  दिव्य  दृष्टी  दे  कर  उससे  अवगत  कराया  !  यह  दिव्य  दृष्टी  ही  प्रग्या  बोध  है  ! अतंता  निर्गुण  निराकार  सर्वव्यापी   सर्वग्य  , सार्वभौम  चेतन  राम  ही  एकमात्र  मालक चालक  परमात्मा  है  ज़िसके  स्वरूप  को  खुद  परमात्मा  कबीर  प्राप्त  हुवे  ! अपनी  पवित्र  वाणी  बीजक  मे  यही  दिव्य  दृष्टी  कबीर  साहेब  हमे  देते  हुवे  बताते  है  इस  दिव्य  दृष्टी  को  वही  प्राप्त  कर  सकता  है  जो  शिल  सदाचार  भाईचारा  समता ममता  विश्वबंधुत्व  का  मुलभारतिय  हिन्दूधर्म  का  पुरा  और  विशुद्ध  रूप  से  पालन  करता  हो  ! 

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती 
मुलभारतिय हिन्दुधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान,
कल्याण , अखण्ड हिन्दुस्तान, शिवशृष्टी

Saturday, 7 February 2026

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Hindola : 1 : 8

पवित्र बीजक : प्रग्या बोध :  हिण्डोला 1 :  8

हिण्डोला  : 1 : 8

झुलत  बिरंची  महेश  शुक  मुनि , झुलता  सुरज  चन्द्र  ! 

शब्द  अर्थ  : 

झुलत = हिण्डोला  झुलना  ! बिरंची  = वैरागी  ! महेश  = शंकर  , शिव  ! शुक  मुनि  = तपस्वी  !  सुरज  चन्द्र  = चांद  सूर्य  ! 

प्रग्या  बोध : 

परमात्मा  कबीर  हिण्डोला के  इस  पद  में  कहते  है भाईयों  संसार मे  केवल  सामान्य  मानव  इच्छा  तृष्णा  ग्रस्त  है  एसा  नही  है  जो  बडे  बडे  नामचिन  लोग  जैसा  बिरंची  शिव  , मुनि  और  तपस्वी  भी  यही  भवचक्र  का  झुला  झुल  रहे  है  !  यही  नही  चन्द्र  और  सूर्य  भी  इच्छा  ग्रस्त  है ,  वरणा  उनको  एसे  घुमते  रहने  की  क्या  जरूरत  है  ?   बचा  वही  जो  परमात्मा कबीर  है  और  कबीरवाणी  का  धर्म  आचरण  करता  है  ! 

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती  
मुलभारतिय हिन्दूधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान 
कल्याण , अखण्ड हिन्दुस्तान, शिवशृष्टी

Friday, 6 February 2026

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Hindola : 1 : 7

पवित्र बीजक : प्रग्या बोध : हिण्डोला 1 : 7

हिण्डोला : 1 : 7

झुलत नारद शारदा , झुलत व्यास फणिन्द्र !

शब्द अर्थ : 

झुलत = हिण्डोला झुलना ! नारद = वैदिक नारद मुनी ! शारदा = वैदिक विद्दया देवी ! व्यास = वेद , महाभारत का लेखक ! फणिद्र = वैदिक विष्णु ! 

प्रग्या बोध : 

परमात्मा कबीर हिण्डोला के इस पद में कहते है भाईयों आप ज़िन विदेशी यूरेशियन वैदिक ब्राह्मणधर्म के देवी देवता रूषी मुनी को महान मानते हो जैसे मुनी नारद , विद्दया की देवी शारदा , रूषी व्यास और शेषनाग पर लेटा विष्णु भगवान सब इस संसार के फस कर रह गये ! जन्म लिया और मर गये पर निर्वाण नही प्राप्त कर सके वे आज भी भवचक्र में फसे हुवे है ! इन में से वैदिक ब्राह्मनोने बहुत सारे पात्र मुलभारतिय हिन्दूधर्म के एक समतावादी पंथ बौद्ध मत से चुराये हुवे है क्यू की वैदिक ब्राह्मणधर्म के सभी ग्रांथो की रचना 7 से 10 शती के बिच मौर्य और बौद्ध पात्रोंकी चौरी कर बनाई गयी ! 

जो भी विषमातावादी , वर्णजाती वादी , ऊचनीच अस्पृष्यता छुवाछुत भेदभाव , शोषण वादी , मनुवादी विचार के धर्म है वह वस्ताव मे अधर्म और विकृती है उससे भला कोई कैसे चेतन राम के दर्शंन कर सकता है ? एसे पापी लोग संसार में भटक रहे है ! 

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती  
मुलभारतिय हिन्दुधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान 
कल्याण , अखण्ड हिन्दुस्तान, शिवशृष्टी

Thursday, 5 February 2026

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Hindola : 1 : 6

पवित्र बीजक :  प्रग्या बोध : हिण्डोला :  1 : 6

हिण्डोला : 1 : 6

झुलत  गण  गन्धर्व  मुनिवर , झुलत  सुरपति  इन्द्र  ! 

शब्द  अर्थ  : 

झुलत = माया  मोह  भरे  भवचक्र  के  संसार  में   हिण्डोला यानी  झुला  झुलना  !  गण  = हिन्दुस्तान  के  गण  राज्य  के  नागरिक  ! गन्धर्व = ग्रीक  , अफगानी  लोग  ! मुनिवर = हिन्दूधर्म  के  ग्यानी  लोग  ! सुरपति  = राजे  लोग  ! इन्द्र  = विदेशी  यूरेशियन  वैदिक ब्राह्मणधर्मी राजा  ! 

प्रग्या बोध : 

परमात्मा  कबीर  हिण्डोला  के  इस  पद  में  कहते  है  भाईयों  ये  संसार  झुला  है ,  हिण्डोला  है  ! भवचक्र  है  और  इसमे  फसकर  लोग  चाहे  वो  नाग  लोक  हो ,  ग्रीक , अफगानी  हो , धर्मग्यानी  हो  या  विदेशी  यूरेशियन  वैदिक ब्राह्मणधर्म  के  राजा  इन्द्र  हो  या  उनके  अन्य  देवता , ब्राह्मण  सभी  भवचक्र  के  इस  हिण्डोला  मे  जन्म  मृत्यू  के  फेरे  में  फस  गये  है !   इसके  दुख  भरे  मार   से  वही  बच  पाये  है  जो  मुलभारतिय  हिन्दूधर्म  के  शिल  सदाचार  के  धर्म  मार्ग  पर  चले  है  ! 

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती 
मुलभारतिय हिन्दुधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान, 
कल्याण , अखण्ड हिन्दुस्तान, शिवशृष्टी

Wednesday, 4 February 2026

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Hindola : 1 : 5

पवित्र बीजक : प्रग्या बोध : हिण्डोला : 1 : 5

हिण्डोला : 1 : 5 

कर्म पटरिया बैठि के , को को न झूले आनि ! 

शब्द अर्थ : 

कर्म पटरिया = कर्म के दो पाट , मार्ग ! बैठि के = निच्छित कर ! को को न = कोन नही ! झूले आनि = झुलने आना !

प्रग्या बोध : 

परमात्मा कबीर हिण्डोला के इस पद में कहते है भाईयों संसार मे आया प्रतेक जीव जन्तु वस्तु कर्म से बंधा है और कर्म फल से भी ! जो निषक्रियता है वो भी कर्म है और क्रियशिलता भी कर्म है , इस लिये कर्म फल की चिंता न करते हुवे धर्म का पालन करो ! और उसके लिये धर्म क्या है अधर्म क्या है ये जानना जरूरी है ! धर्म है शिल सदाचार सत्य अहिंसा समता ममता भाईचारा विश्वबंधुत्व ! अधर्म है वर्णजाती वाद , ब्राह्मणवाद , मनुवाद , वसाहतवाद , पुंजीवाद अहंकार झूठ बोलना आदी इस अधर्म से बचकर रहो ! जीना है तो एसे जीवो ! 

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती 
मुलभारित्य हिन्दूधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान,  
कल्याण , अखण्ड हिन्दुस्तान, शिवशृष्टी

Tuesday, 3 February 2026

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Hindola : 1 : 4

पवित्र बीजक :  प्रग्या बोध :  हिण्डोला  : 1 : 4

हिण्डोला  : 1 : 4

शुभ  अशुभ  बनाये  ड़ाँड़ी , गहे  दूनों  पानि  ! 

शब्द  अर्थ  : 

शुभ  अशुभ  = ऊचित  अनुचित  !  बनाये  ड़ाँड़ी  = बनाये  आधार  ! गहे  दूनों  पानि  = दोनो  पानि  मे  गये ,  गंगा  नहाने  जैसे  सोपस्कार   ! 

प्रग्या  बोध : 

परमात्मा  कबीर  हिण्डोला  के  इस  पद  में  कहते  है  भाईयों  शुभ  अशुभ  के  दो  ड़ण्डो  का  आधार  लेकार  वैदिक  ब्राह्मणधर्मी  लोगोने  धन्धा  किया  और  गंगा  नहाने  से  पाप  मुक्त  होता  है  एसा  सोपस्कार  बना  ड़ालां  जब  की  कोई  भी  पानी  अधर्म  को  शुद्ध  नही  कर  सकता  उसके  परिणाम  भुगातने  ही  पडते  है !  इस  लिये  शिल  सदाचार  का  धर्म  मुलभारतिय  हिन्दूधर्म  का  पालन करना  ही  ऊचित  है  ! 

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती 
मुलभारतिय हिन्दूधर्म विश्वपीठ  प्रतिष्ठान, कल्याण,अखण्ड हिन्दुस्तान, शिवशृष्टी

Monday, 2 February 2026

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Hindola : 1 : 3

पवित्र बीजक :  प्रग्या बोध : हिण्डोला  : 1 : 3

हिण्डोला  : 1 : 3

लोभ  भँवरा  विषय  मरुवा , काम  कीला  ठानि  ! 

शब्द  अर्थ  : 

लोभ  = लालच  !  भँवर  = भ्रमर  ! विषय  = इच्छा  !  मरुवा  = मर्त्य  ! काम  = वासना  ! कीला  = किल  ! ठानि  = समजो  ! 

प्रग्या  बोध : 

परमात्मा  कबीर  हिण्डोला  के  इस  पद  में  कहते  है  भाईयों  लालच  यह  एसी  वस्तु  है  जैसे  कोई  भ्रमर  हो  जो  किसी  वस्तु  पर  मंडराने  लगे  तो  बिना  उसपर  बैठे  वहा  से  हटता  नही  और  उसी  पर  मंडराते   रहता  है  !  काम  वासना  एसी  है  जैसे  किल  जो  चुभन  देती  है  ,  दर्द  देती  है  पर  तब  भी  वह  उसे  चाहती  है  !  यही  लोभ  इच्छा  तृष्णा  माया  वासना  कामना  लालच  ज़िसका  स्वरूप  भँवरे  जैसा  है  काल  के  किल  जैसा  है  अंतता  बार  बार  भवचक्र  मे  जन्म  मृत्यू  के  फेरे  में  ड़ाल  कर  दुख  देती  है  ! 

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती  
मुलभारतिय हिन्दुधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान,
कल्याण , अखण्ड हिन्दुस्तान, शिवशृष्टी

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Hindola : 1 : 2

पवित्र बीजक :  प्रग्या बोध  : हिण्डोला  : 1 : 2

हिण्डोला  : 1 : 2

पाप  पुण्य  के  खम्भा दोऊ  , मेरू  माया  माँहि ! 

शब्द  अर्थ  : 

पाप  पुण्य  =  कर्म  फल  ! खाम्भा  दोऊ  = दो  आधार  !  मेरू  = बिच  मे  ! माया  = मोह  ! माँहि  = अहंकार  ! 

प्रग्या  बोध  : 

परमात्मा  कबीर  हिण्डोला  के  इस  पद  में  कहते  है  भाईयों  माया  मोह  अहंकार  कर्म  का  झुला  झुलते  है  और  उसका  फल  होता  है  पाप  पुण्य  ! यही  पाप  पुण्य  सुख  और  दुख  अगला  हर  पल  जन्म  निच्छित  करते  हुवे  भवचक्र  यह  झुला  आप  को  निरंतर  झुलता  रहता  है  ! इस  से  बाहर  वही  निकल  सकता  है  जो  मुलभारतिय  हिन्दूधर्म  का  एक  मात्र  धर्मग्रंथ  कबीरवाणी  पवित्र  बीजक  में  बताया  शिल  सदाचार भाईचारा  समता  ममता विश्वबंधुत्व  एकेश्वर  निराकार  निर्गुण  चेतन  तत्व  राम  के  सत्यधर्म  समताधर्म  का पालन  करता  है  ! 

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती  
मुलभारतिय हिन्दुधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान 
कल्याण, अखण्ड हिन्दुस्तान,  शिवशृष्टी