हिण्डोला : 1 : 5
कर्म पटरिया बैठि के , को को न झूले आनि !
शब्द अर्थ :
कर्म पटरिया = कर्म के दो पाट , मार्ग ! बैठि के = निच्छित कर ! को को न = कोन नही ! झूले आनि = झुलने आना !
प्रग्या बोध :
परमात्मा कबीर हिण्डोला के इस पद में कहते है भाईयों संसार मे आया प्रतेक जीव जन्तु वस्तु कर्म से बंधा है और कर्म फल से भी ! जो निषक्रियता है वो भी कर्म है और क्रियशिलता भी कर्म है , इस लिये कर्म फल की चिंता न करते हुवे धर्म का पालन करो ! और उसके लिये धर्म क्या है अधर्म क्या है ये जानना जरूरी है ! धर्म है शिल सदाचार सत्य अहिंसा समता ममता भाईचारा विश्वबंधुत्व ! अधर्म है वर्णजाती वाद , ब्राह्मणवाद , मनुवाद , वसाहतवाद , पुंजीवाद अहंकार झूठ बोलना आदी इस अधर्म से बचकर रहो ! जीना है तो एसे जीवो !
धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस
दौलतराम
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती
मुलभारित्य हिन्दूधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान,
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