Friday, 20 February 2026

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Hindola : 2 : 2

पवित्र बीजक : प्रग्या बोध :  हिण्डोला : 2 : 2

हिण्डोला  : 2 : 2

जाहि   न   इच्छा  झुलबे  की , एसी  बुधि  केहि  पास  ! 

शब्द  अर्थ  : 

जाहि  न  = जहा  नही  ! इच्छा  = चाहत , मोह ! झुलबे  की  =  संसार  की  ,  हिण्डोला  मे  झुलने  की ! एसी  बुधि  = एसी  मति  , समझ , ग्यान  ! केहि   पास  = किसके  पास  है  ! 

प्रग्या  बोध  : 

परमात्मा  कबीर  हिण्डोला के  इस  पद  में  कहते  है भाईयों  संसार  में  इच्छा  तृष्णा  वासना  कामना लालच  माया  मोह  रहित  कोई  नही  है !  इसी  कारण  यहाँ  जन्म  मृत्यू  के  फेरे  में  हर  कोई  फसा है !  इच्छा  नही  , तृष्णा  नही  एसी  मति  , ग्यान  , प्रग्याबोध  रखने  वाले लोग बहुत  कम  है  क्यू  की  सत्यधर्म  का  पालन  करने  वाले  लोग  कम  है  इस  लिये  झुला  झुलने  वालोंकी  भीड  ही  अधिक  है  !

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती 
मुलभारतिय हिन्दुधर्म विश्वपीठ ,
कल्याण , अखण्ड हिन्दुस्तान , शिवशृष्टी

Thursday, 19 February 2026

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Hindola : 2 : 1

पवित्र बीजक : प्रग्या बोध :  हिण्डोला  :  2 : 1

हिण्डोला :  2 : 1

बहु  विधी  चित्र  बनाय  के ,  हरि  रचिन  क्रीडा   रास  !

शब्द  अर्थ  : 

बहु  बिधि  = अनेक  प्रकार  के !  चित्र  बनाय =   वस्तु , जीव  जन्तु   ! हरि  = चेतन  तत्व  राम  ! क्रीडा  रास   = खेल  ! 

प्रग्या  बोध  : 

परमात्मा कबीर हिण्डोला के इस पद में कहते है भाईयों  संसार एक प्रकार  का  खेल  का  मैदान  है  ज़िसमे  चेतन  राम  हरि  यानी  इच्छा रहित  बनकर  खेल  कर  रहे  है  ! 

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती  
मुलभारतिय हिन्दुधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान 
कल्याn , अखण्ड हिन्दुस्तान , शिवशृष्टी

Wednesday, 18 February 2026

Shivaji Maharaj Dalit The ! Daulatram

#छत्रपती_शिवाजी_महाराज_दलित_थे  ! 

कवडी की माला दलित की l पहचान  :  

ऐतिहासिक रूप से, दलितों (विशेषकर केरल ,आंध्र , महाराष्ट्र और अन्य क्षेत्रों में) को  फूटी  कौड़ी  की माला पहनने के लिए मजबूर किया जाता था। यह उनकी निम्न जाति की स्थिति को दर्शाने, उन्हें सवर्णों से अलग पहचानने और उन पर सामाजिक बंदिशें (जैसे ऊपरी कपड़े न पहनने देना) लागू करने का एक दमनकारी प्रतीक था, जिसे बाद में अय्यंकली जैसे नेताओं के प्रयासों से खत्म किया गया। 

दमनकारी पहचान: 

कौड़ी की माला दलितों को "अछूत" के रूप में दूर से ही पहचानने की एक पहचान थी।
गुलामी का प्रतीक: यह सामाजिक असमानता और गुलामी को दर्शाता था, जिसे पहनना उस समय अनिवार्य माना जाता था।

परिधान नियम: 

यह प्रथा दलित महिलाओं पर ऊपरी शरीर को न ढकने के नियम का हिस्सा थी।
विरोध और अंत: दक्षिण भारत में अय्यंकली ने इस कुप्रथा के खिलाफ लड़ाई लड़ी और दलित महिलाओं को इस माला को फेंककर सम्मान से जीने का अधिकार दिलाने का नेतृत्व किया। 
कौड़ी की माला का उपयोग सामाजिक तौर पर एक "चिह्न" के रूप में किया जाता था ताकि ऊँची जाति के लोग अपनी शुद्धता बनाए रख सकें और दलितों की उपस्थिति को पहचान सकें। 

तुलजा  भवानी  : 

तुलजा  भवानी  शिवाजी  कुल  की  कुल  देवाता को  फूटी कवाडी  की  माला  पहने  देखा  जा  सकता  है  , कबीर  पन्थी  को  भी  तुलसी  की  माला  या कवडी  की  माला  या  रुद्राक्ष  की  माला  ही पहनने की अनुमती  थी  ! 

छत्रपती  शिवाजी  महाराज  के  माता  पिता  का दोनो  कुल  जाधव  और  भोसले  कबीर  पन्थी  दालित  ही  थे  !  जैसे  की  गांधी  और  आम्बेडकर  परिवार  ! 

अनंता  यह  प्रतित  होता  है  की  छत्रपती  शिवाजी  माहाराज   दलित  थे  जो  अपनी  शुझबुझ  , संघटन कुशलता  और  अनोखी  तखनिक  गनिमी  कावा की  युद्ध  निती  और  माँ  ज़िजाई  की  इच्छा  और   कबीर पन्थी  गुरू   मौनी  महाराज  और   बहादुर दलित मावला  सैनिक  निष्ठा  के  कारण  समतावादी  स्वदेशी  हिन्दवी  स्वराज  स्थापन  कर  सके  ! 

आज  छत्रपती  शिवाजी  माहाराज  की  जयंती  है  ! 
कबीर  अनुयायी  मुलभारतिय  हिन्दूधर्मी  छत्रपती शिवाजी  महाराज  की  जय  ! 

#दौलतराम

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Hindola : 1 : 19

पवित्र बीजक : प्रग्या बोध  : हिण्डोला  :  1 : 19

हिण्डोला  : 1 : 19

कहहिं  कबीर  सत  सुकृत  मिलै  , तो  बहुरि  न  झुले  आन  ! 

शब्द  अर्थ  : 

कहहिं कबीर = कबीर  कहते  है  ! सत  सुकृत  = सन्त क्रियावान  ! मिलै  = मिले  ! तो  बहुरि  = तो  फिर  ! न  झुले  आन = फिर  इस  हिण्डोला   मे  न  फसे  ! 

प्रग्या  बोध : 

परमात्मा  कबीर  हिण्डोला  के  इस  पद  में  कहते  है  भाईयों  संसार  रूपी  इस  हिण्डोला  का  आनन्द  बिना  फसे  कैसे  उठाये  यह  जानकार  क्रियाशिल   संत  ही  दे  सकता  है  बातुनी  संत  नही  !  ऐसा  संत  विरला  होता  है  ज़िसने  इस  झुले  को  झुला  भी  और  बेदाग  बाहर  आया  !  ये  विरक्ती  की  शिक्षा  बडी  अद्भूत  शिक्षा  है  जो  कोई  ग्यानी  ही  दे  सकता  है  ज़िस  ने  चेतन  राम  तत्व  के  स्वरूप  को  खुद  पहचान  लिया  हो  !  सुनी  सुनायी  बात  पर  भरोसा  न करो  !  एसे  रस्ते  चलो  जीसका  जानकार  गुरू  खुद  उस  रास्ते  चल  कर  निर्वांण  की  अवस्था   हासिल  की  हो  !  विदेशी यूरेशियन वैदिक ब्राह्मणधर्मी  पंडित  जो  स्वर्ग  नर्क  होम  हवन  आदी  का  जो  मार्ग  बताते   है  झूठ  है  ! वे  झूठे  गुरू  है  कोई  साधु  सन्त  नही  ! वो  मार्ग  और  धर्म  ही  गलत  है  जो  समता  शिल  सदाचार  के  रास्ते  पर  न  चले  ! 

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती 
मुलभारतिय हिन्दुधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान, कल्याण ,अखण्ड हिन्दुस्तान, शिवशृष्टी

Tuesday, 17 February 2026

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Hindola : 1 : 18

पवित्र बीजक : प्रग्या बोध :  हिण्डोला  : 1 : 18

हिण्डोला  : 1 : 18 

ये  झुलबे  को  भय  नहिं  , जो  होय  सन्त  सुजान  : 18

शब्द  अर्थ  : 

ये  झुलबे  = इस  संसार  रूपी  हिंडोले  ! को  = इसका  ! भय  नहिं  = भय  , डर  नही  लगाता  है  ! जो  होय  = जो  है  ! सन्त  सुजान  =  जानकार , ग्यानी  ! 

प्रग्या  बोध : 

परमात्मा  कबीर  हिण्डोला  के  इस  पद  में  कहते  है  भाईयों  इस  संसार  का  भय  या  डर  उन  ग्यानी , जानकार ,  प्रग्याबोधी  साधु  संत  गुरूजानो  को  नही  लगता  है  जीनको  इस  संसार  रूपी  झुले  के  स्वरूप  , कार्यपद्धती  , तंत्र  और  चालने  वाले  की  मनशा जानता  हो  !  भाई  ये संसार  रूपी  झुला  परमात्मा  ने  आपको  परेशान  करने   के  लिये  नही  बनाया  है  बल्की  इसे  आपके  खुशी  , मनोरंजन  के  लिये  बनाया  है !   तब  तक  इस  में  बेडर  खुशी और  आनन्द  ले  कर  झुलो  जब  तक  तुम  कुछ  उल्टेसिधे  काम  नही  करते  , उसके  तंत्र  नियम के  साथ  छेडछाड   नही  करते  ,  बगावत  नही  करते  ! धर्म  नियम  न  मानोगे  , झुले  के  मालिक  का  कहना  इच्छा  आदेश  संकेत  नही  मानोगे  तो  झुले  के  भवचक्र  , परिणाम  , जन्म  मृत्य  के  फेरे   फस  जावोगे  !  अच्छे  कर्म  करो  तो  अच्छा  फल यही  उस  मालिक  चेतन  तत्व  राम  का  संकेत  है  जो  लगातार  आपको  वह  देता  रहता  है  !  उसे सुनो  अंतरआत्मा  राम  की  आवाज  सुनो  वो  तुम्हे  खुशी  देना  चाहता  है  दुख  नही !  दुख  का  चयान तो  तुम  लालच  माया  मोह  अहंकार  आदी  के  कारण  अग्यानी  बन  कर  करते  हो  !  जो  साधु  सज्जन  इसे  जानता  वही  सुजान  संत  है  ! 

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती 
मुलभारतिय हिन्दुधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान 
कल्याण , अखण्ड हिन्दुस्तान, शिवशृष्टी

Monday, 16 February 2026

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Hindola : 1 : 17

पवित्र  बीजक :  प्रग्या बोध : हिण्डोला : 1 : 17

हिण्डोला  : 1 : 17

साधु  संगति  खोजि   देखहु , बहुरि न  उलटि  समाय  !

शब्द  अर्थ  : 

साधु  संगति  = साधु  की  बैठक  , संगत  ! खोजि  देखहु  = जा  कर  देखा  ! बहुरि न  उलटि  समाय  = फिर  जाने  की  इच्छा  नही  हुवी  ! 

प्रग्या  बोध : 

परमात्मा  कबीर  हिण्डोला  के  इस  पद  में  कहते  है  भाईयों  मैने  बहुत  सारे  साधु  की  मंडली  देखि !   वहा  जाकर  उनकी  बात  सुनी !   रहन. सहन   देखा  खानपान  , आचार   विचार  देखे !   पर  मुझे  कोई  शिल  सदाचार  भाईचारा समता नही  दिखी  ! जाती  वर्ण  ऊचनीच  भेदभाव  अस्पृष्यता  देखि !  हत्या  झूठ  देखा   गांजा  मदिरा  का  सेवन  देखा !  नशा  व्यभिचार  देखा !  कोई  त्याग  , सत्य  संयम  नही  दिखा  !  एसी  साधु  संगती  मे  मै  फिर  कभी  नही  गया  जहा  धर्म  नही ! 

साधु  की  मंडली , संगती  धर्म  के  लिये  होना  चाहिये  नाकी  दिखावे  के  लिये  ! एसे  साधु  से  तो संसारी  भला  ! 

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती  
मुलभारतिय हिन्दुधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान 
कल्याण , अखण्ड हिन्दुस्तान, शिवशृष्टी

Sunday, 15 February 2026

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Hindola : 1 : 16

पवित्र बीजक : प्रग्या बोध :  हिण्डोला : 1 : 16 

हिण्डोला  : 1 : 16

तहाँ  से  बिछुरे  बहु  कल्प  बीते , भूमि  परे  भूलाय  ! 

शब्द  अर्थ  : 

तहाँ से  = चेतन  तत्व  राम  प्रग्या  बोध  से ! बिछुरे = अलग  हुवे  ! बहु  कल्प  बीते  = बहुत  समय  हुवा  है  ! भुमि  परे  भूलाय  = पृथ्वी पर  जन्म  लेते  है  भूल  गये  ! 

प्रग्या  बोध  : 

परमात्मा  कबीर  हिण्डोला  के  इस  पद  में  कहते. है  भाईयों  आप  वस्तुता  वो  चेतन  तत्व  राम  मालिक  है  जो  निराकार  निर्गुण  अजर  अमर सर्वव्यापी  सार्वभौंम  परमात्मा  हो !  पर  आप  पृथ्वी  पर  जीव  जन्तु  प्राणी  पक्षी  आदी  जन्म  लेते  ही  खुद  की  जानकारी  भूल  कर  मर्त्य  जीव  बन  कर  कुशल  अकुशल  कर्म  करते  हो !  और  उसके  परिणाम  स्वरूप  बार  बार  जन्म  लेते  हो  मरते  हो  ! तुम्हे  तुम  क्या  हो  याद  नही  पर  मै  याद  दिलाना  चाहता   हूँ  क्यू  की  तुम  दुख्ख  भरे  भवचक्र  जन्म  मृत्यू  के  फेरे  से  धर्म  पालन  कर  बच  सको  ! 

धर्म  पालन  करो  अधर्म  को  छोडो  तो  तुम्हे  तुम्हारे  वास्तविक  स्वरूप  का पता  चले   , कुछ  याद  आये  ! 

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती 
मुलभारतिय हिन्दुधर्म  विश्वपीठ प्रतिष्ठान 
कल्याण , अखण्ड हिन्दुस्तान, शिवशृष्टी