पवित्र बीजक : प्रग्या बोध : हिण्डोला : 1 : 15
हिण्डोला : 1 : 15
काल एकाल परलय नहीं , तहाँ सन्त बिरले जाहिं !
शब्द अर्थ :
काल अकाल = जन्म मृत्यू , समय का बन्धन ! परलय = क्षय , नाश , विनाश , समाप्ती ! नहीं = नही है ! तहाँ = उस जगह , स्तिथी में ! सन्त = ग्यानी , प्रग्या बोधी ! बिरले = क्वचित ! जाहिं = पहूचना !
प्रग्या बोध :
परमात्मा कबीर हिण्डोला के इस पद में कहते है भाईयों ये संसार मर्त्य है ज़हाँ जन्म मृत्यू काल है ! मोह माया का फंदा है ! कर्म है , कारण है , फल है ! धर्म अधर्म है ! पर यहा जन्म लेकार जीना मरना अनिवार्य है ! कोई बिरला पहूचां हुवा साधु संत माहत्मा मुनी प्रग्या बोधी ही यहाँ उत्तम धर्म कर निर्मल रह कर उस स्थिती या अवस्था , पद को प्राप्त होता है ज़िसे निर्वांण मोक्ष कहते है ! कबीरसत्व परमहंस कहते है ! यह अवस्था उस निराकार निर्गुण चेतन तत्व राम की है , जो खुद परमात्मा कबीर है !
एक राम दशरथ का बेटा राम हुवा , दुसरा राम घट घट मे है हर एक प्राणी में है , तिसरा राम जगत है पुरा संसार है विश्व है ! पर इन सभी मे काल है जन्म मृत्यू है , परिवर्तन है क्षय है ! चवथी अवस्था ही निर्वांण मोक्ष राम है ! वही कोई बिरला साधु संत माहत्मा पहूचता है , ज़िसका मार्ग मुलभारतिय हिन्दूधर्म ही है !
धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस
दौलतराम
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती
मुलभारतिय हिन्दुधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान
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