Saturday, 14 February 2026

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Hindola : 1 : 15

पवित्र बीजक : प्रग्या बोध : हिण्डोला  : 1 : 15

हिण्डोला  : 1 : 15

काल  एकाल  परलय  नहीं , तहाँ  सन्त  बिरले  जाहिं  ! 

शब्द  अर्थ  : 

काल  अकाल  = जन्म  मृत्यू  , समय  का  बन्धन  !  परलय  =  क्षय  , नाश , विनाश  , समाप्ती  !  नहीं  = नही  है  ! तहाँ  = उस  जगह  , स्तिथी  में  ! सन्त  = ग्यानी  , प्रग्या  बोधी  ! बिरले  = क्वचित  ! जाहिं  = पहूचना  ! 

प्रग्या  बोध : 

परमात्मा  कबीर  हिण्डोला  के  इस  पद  में  कहते  है  भाईयों  ये  संसार  मर्त्य  है  ज़हाँ  जन्म  मृत्यू  काल  है !   मोह  माया  का  फंदा  है  !  कर्म  है  , कारण  है  , फल  है  !  धर्म  अधर्म  है  !  पर  यहा  जन्म  लेकार  जीना  मरना  अनिवार्य  है  !  कोई  बिरला  पहूचां  हुवा  साधु  संत  माहत्मा  मुनी  प्रग्या  बोधी  ही  यहाँ  उत्तम   धर्म  कर  निर्मल  रह  कर  उस  स्थिती  या  अवस्था  , पद  को  प्राप्त  होता  है  ज़िसे  निर्वांण  मोक्ष  कहते  है  !  कबीरसत्व परमहंस कहते है  !  यह  अवस्था  उस  निराकार  निर्गुण  चेतन  तत्व   राम  की  है ,  जो  खुद  परमात्मा  कबीर  है  ! 

एक  राम  दशरथ  का  बेटा  राम  हुवा  , दुसरा  राम  घट  घट  मे  है  हर  एक  प्राणी  में  है  , तिसरा राम  जगत  है  पुरा  संसार  है  विश्व  है  !  पर  इन  सभी  मे  काल  है  जन्म  मृत्यू  है  , परिवर्तन  है  क्षय  है  ! चवथी  अवस्था  ही  निर्वांण  मोक्ष  राम  है !  वही  कोई  बिरला  साधु  संत  माहत्मा  पहूचता  है , ज़िसका  मार्ग  मुलभारतिय  हिन्दूधर्म  ही  है  ! 

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती 
मुलभारतिय हिन्दुधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान 
कल्याण , अखण्ड हिन्दुस्तान, शिवशृष्टी

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