पवित्र बीजक : प्रग्या बोध : हिण्डोला : 1 : 17
हिण्डोला : 1 : 17
साधु संगति खोजि देखहु , बहुरि न उलटि समाय !
शब्द अर्थ :
साधु संगति = साधु की बैठक , संगत ! खोजि देखहु = जा कर देखा ! बहुरि न उलटि समाय = फिर जाने की इच्छा नही हुवी !
प्रग्या बोध :
परमात्मा कबीर हिण्डोला के इस पद में कहते है भाईयों मैने बहुत सारे साधु की मंडली देखि ! वहा जाकर उनकी बात सुनी ! रहन. सहन देखा खानपान , आचार विचार देखे ! पर मुझे कोई शिल सदाचार भाईचारा समता नही दिखी ! जाती वर्ण ऊचनीच भेदभाव अस्पृष्यता देखि ! हत्या झूठ देखा गांजा मदिरा का सेवन देखा ! नशा व्यभिचार देखा ! कोई त्याग , सत्य संयम नही दिखा ! एसी साधु संगती मे मै फिर कभी नही गया जहा धर्म नही !
साधु की मंडली , संगती धर्म के लिये होना चाहिये नाकी दिखावे के लिये ! एसे साधु से तो संसारी भला !
धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस
दौलतराम
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती
मुलभारतिय हिन्दुधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान
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