पवित्र बीजक : प्रग्या बोध : हिण्डोला : 1 : 12
हिण्डोला : 1 : 12
खण्ड ब्रह्मांड खोजि देखहु , छूटत कितहूँ नाहिं !
शब्द अर्थ :
खण्ड = धरती ! ब्रह्माण्ड = आकाश ! खोजि देखहु = खोजा और देखा ! छूटत = मुक्त ! कितहूँ नाहिं = कोई नही !
प्रग्या बोध :
परमात्मा कबीर हिण्डोला के इस पद में कहते है भाईयों संसार को शृष्टी को हमने बहुत खोज कर देखा चाहे धरती हो य़ा आकाश यहाँ कोई पुरी तरह मुक्त नही है ! हर कोई किसी न किसी प्रकार बन्धन में है ! जन्म मृत्यू के फेरे से और कार्य कारण भाव से बांधे है और इस बन्धन का डोर है सुत्र है इच्छा माया मोह अहंकार लालच तृष्णा वासना कामना चाहत जैसे पकडो ये डोर लंबा ही होता जाता है ! और अधिक बंधे चले जाते है ! मुक्त कोई बिरला ही है जो शिल सदाचार का मुलभारतिय हिन्दूधर्म मार्ग पर चलता है !
धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस
दौलतराम
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती
मुलभारतिय हिन्दूधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान,
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