पवित्र बीजक : प्रग्या बोध : हिण्डोला : 1 : 18
हिण्डोला : 1 : 18
ये झुलबे को भय नहिं , जो होय सन्त सुजान : 18
शब्द अर्थ :
ये झुलबे = इस संसार रूपी हिंडोले ! को = इसका ! भय नहिं = भय , डर नही लगाता है ! जो होय = जो है ! सन्त सुजान = जानकार , ग्यानी !
प्रग्या बोध :
परमात्मा कबीर हिण्डोला के इस पद में कहते है भाईयों इस संसार का भय या डर उन ग्यानी , जानकार , प्रग्याबोधी साधु संत गुरूजानो को नही लगता है जीनको इस संसार रूपी झुले के स्वरूप , कार्यपद्धती , तंत्र और चालने वाले की मनशा जानता हो ! भाई ये संसार रूपी झुला परमात्मा ने आपको परेशान करने के लिये नही बनाया है बल्की इसे आपके खुशी , मनोरंजन के लिये बनाया है ! तब तक इस में बेडर खुशी और आनन्द ले कर झुलो जब तक तुम कुछ उल्टेसिधे काम नही करते , उसके तंत्र नियम के साथ छेडछाड नही करते , बगावत नही करते ! धर्म नियम न मानोगे , झुले के मालिक का कहना इच्छा आदेश संकेत नही मानोगे तो झुले के भवचक्र , परिणाम , जन्म मृत्य के फेरे फस जावोगे ! अच्छे कर्म करो तो अच्छा फल यही उस मालिक चेतन तत्व राम का संकेत है जो लगातार आपको वह देता रहता है ! उसे सुनो अंतरआत्मा राम की आवाज सुनो वो तुम्हे खुशी देना चाहता है दुख नही ! दुख का चयान तो तुम लालच माया मोह अहंकार आदी के कारण अग्यानी बन कर करते हो ! जो साधु सज्जन इसे जानता वही सुजान संत है !
धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस
दौलतराम
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती
मुलभारतिय हिन्दुधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान
No comments:
Post a Comment