पवित्र बीजक : प्रग्या बोध : बेलि : 1 : 28
बेलि : 1 : 28
सरवर जरि भौ धूरि , हो रमैया राम !
शब्द अर्थ :
सरवर = संसार रूपी सागर ! जरी = जलना ! धूरि = धुर निकलना ! हो रमैया राम = हे राममय साधु संतो !
प्रग्या बोध :
परमात्मा कबीर बेलि के इस पद में कहते है भाईयों सागर तो पानी से बना है ज़िसका स्वरूप शितलता है आग पानी से बुजती है आग को पानी शांत कर देता है पर अगर शांत सागर में धुर निकलने लगे तो समजो तलहटी मे कुछ गडबड हो रही है कुछ ज्वाला मुखी फट रहे है और उसका गर्म लावा आग के शोले बनकर बाहर आ रहा है वैसे ही शांत मन मे अशांती किसी चाहता इच्छा तृष्णा वासना माया मोह अहंकार का दानव आता है मन बेचैन हो कर पुरे शरीर को ही दुख देता है ! इसे धिरज और शिल सदाचार के धर्म मार्ग से ही शांत किया जा सकता है !
धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस
दौलतराम
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती
मुलभारतिय हिन्दूधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान
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