Friday, 23 January 2026

Pavitra Bijak : Pragya Bodh : Birhuli : 1 : 6

पवित्र बीजक  : प्रग्या बोध  : बिरहुली  : 1 : 6

बिरहुली  : 1 : 6 

छिछिलि  बिरहुली  छिछिलि  बिरहुली 
छिछिलि  रहल  तिहुँलोक  बिरहुली  ! 

शब्द  अर्थ  : 

छिछिलि  =  सतही , उपरी  ! बिरहुली  = जग  , संसार  मे  मोह  माया  ! तिहुँलोक  = त्रिकाल  ! 

प्रग्या  बोध : 

परमात्मा  कबीर  बिरहुली  के  इस  पद  में  कहते  है भाईयों  यह  संसार  जग  सतही  बातो  को  जादा  महत्व  देता  है  पर  अंतर्मन   से  विचार  बहुत  कम  करता  है  !  तिनो  समय  सभी  जगह  मानव  मोह  माया  ग्रस्त  है  क्यू  की  उसकी  सोच  ही  सतही  है  जैसे  पत्थर  की  पूजा  ,  तिर्थ  यात्रा  , गंगा  नहाना , ब्राह्मण  ने  बताते   कर्म  कांड  और  अंध  श्रद्धा  , अंध  विश्वास  !  ये  सब  सतही  बाते  है  धर्म  कम  , कर्म  कांड  जादा  है  !  छुवाछुत  , भेदभाव  ऊचनीच , जाती  वर्ण  जनेऊ  होमहवन  गाय  बैल  घोडे  की  बली  , चौरी  झूठ  मक्कारी  बलात्कारी  देव  आदी  में  कहा  धर्म  है  ? 

धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस 
दौलतराम 
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती 
मुलभारतिय हिन्दूधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान, 
कल्याण , अखण्ड हिन्दुस्तान , शिवशृष्टी

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