पवित्र बीजक : प्रग्या बोध : बिरहुली : 1 : 6
बिरहुली : 1 : 6
छिछिलि बिरहुली छिछिलि बिरहुली
छिछिलि रहल तिहुँलोक बिरहुली !
शब्द अर्थ :
छिछिलि = सतही , उपरी ! बिरहुली = जग , संसार मे मोह माया ! तिहुँलोक = त्रिकाल !
प्रग्या बोध :
परमात्मा कबीर बिरहुली के इस पद में कहते है भाईयों यह संसार जग सतही बातो को जादा महत्व देता है पर अंतर्मन से विचार बहुत कम करता है ! तिनो समय सभी जगह मानव मोह माया ग्रस्त है क्यू की उसकी सोच ही सतही है जैसे पत्थर की पूजा , तिर्थ यात्रा , गंगा नहाना , ब्राह्मण ने बताते कर्म कांड और अंध श्रद्धा , अंध विश्वास ! ये सब सतही बाते है धर्म कम , कर्म कांड जादा है ! छुवाछुत , भेदभाव ऊचनीच , जाती वर्ण जनेऊ होमहवन गाय बैल घोडे की बली , चौरी झूठ मक्कारी बलात्कारी देव आदी में कहा धर्म है ?
धर्मविक्रमादित्य कबीरसत्व परमहंस
दौलतराम
जगतगुरू नरसिंह मुलभारती
मुलभारतिय हिन्दूधर्म विश्वपीठ प्रतिष्ठान,
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